मैं ट्रेन की निर्धारित सीट पर बैठा हुआ था, सुबह से बड़े ज़ोरों की भूख-प्यास भी लग रही थी, चूँकि मैं अब रेलवे के तैलीय भोजन से परहेज करने लगा हूँ। तो सोचा कुछ पिया जाए, गर्मी थी तो बहुत सा पानी पीने पर भी प्यास नहीं बुझी।
कुछ लोग कोल्ड्रिंक ले रहे थे। मैंने बस २ बातें बताई -
१. इससे होने वाली कमाई हमारे देश के लोगों के पास न रहकर विदेशों में जाती है।
२. ये बोतलें CO2 (कार्बनडाइ ऑक्साइड) के बिना नहीं भरी जा सकती और हमारे शरीर का नियम है कि इसे ऑक्सीजन की जरुरत होती है, कार्बनडाइ ऑक्साइड की नहीं, यह तो उल्टा प्रभाव ही करेगी।

जब प्यास ज्यादा बढ़ गई, तो फिर मैंने भारतीय पेय "फ्रूटी" ली और देखते ही देखते उसकी करीब १४-१५ बोतल बिक गई, फिर और ग्राहकों की फ्रूटी-मांग पर उसे मना करना पडा। उसने कहा अब तो "कोल्ड्रिंक" ही बचीं है। मुझे अच्छा लगा, कम से कम वहाँ तो किसी ने फिर कोल्ड्रिंक नहीं ली।
ऐसी ही कोशिश आप भी कीजिये। मुश्किल है, पर एक दिन जरुर अच्छा लगेगा।
स्वदेशी भारत, स्वाभिमानी भारत !
साभार: अनंत भारद्वाज जी
जय हिन्द !
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